आज दीपों का पर्व मनाएँ,
हर आँगन में दीप जलाएँ।
लेकिन इस बार दिवाली पर,
एक नया संकल्प भी उठाएँ।
मिट्टी के दीपक की लौ से,
अंधियारे को दूर भगाएँ।
नफरत की दीवारें तोड़ें,
प्रेम के कुछ दीप जलाएँ।
केवल घर ही नहीं सजाना,
मन का कोना भी चमकाना।
भूखे को भोजन मिल जाए,
किसी गरीब के घर मुस्काना।
पटाखों के शोर में गुम हैं,
कितनी चिड़ियों की किलकारी।
धुएँ से दम घुटता है सबका,
क्यों हो ऐसी खुशियाँ हमारी?
इस बार दिवाली ऐसी हो,
धरती माँ भी मुस्काए।
स्वच्छ हवा हो, निर्मल जल हो,
हर बच्चा खुलकर मुस्काए।
सीमा पर जो प्रहरी जागे,
उनके घर भी दीप जलाएँ।
जो अपने घर लौट न पाए,
उनकी याद में शीश झुकाएँ।
लक्ष्मी केवल धन न लाएँ,
ज्ञान का भी वरदान मिले।
हर बेटी को सम्मान मिले,
हर बच्चे को पहचान मिले।
एक दीप शिक्षा के नाम का,
एक दीप सेवा के नाम का।
एक दीप उन वीरों के नाम का,
एक दीप मानवता के नाम का।
आओ मिलकर कसम ये खाएँ,
नई सोच की ज्योत जलाएँ।
दीपावली का अर्थ समझकर,
हर जीवन में प्रकाश फैलाएँ।
दीप जलें तो ऐसा जलें,
हर दिल में उजियारा हो।
सिर्फ एक रात नहीं,
हर दिन दिवाली हमारा हो!
कमल कांत शर्मा
कला अध्यापक
राजकीय उच्चतर बाल माध्यमिक विद्यालय, ए-ब्लॉक, जनकपुरी, दिल्ली
