दिवाली का दिया

मैं दिवाली का दिया हूँ,
सुनो मेरी कहानी।
मिट्टी से हूँ मैं बना हुआ,
है कितनी प्यारी मेरी ज़िंदगानी।

कुम्हार ने मुझको प्यार से गढ़ा,
अपने हाथों से सुंदर रूप दिया।
छोटे-छोटे, प्यारे-प्यारे,
दीपों की कतार में मुझे सजा दिया।

साल भर अँधेरों में सोया था,
आज रोशनी में आया हूँ।
खुशियों की इस प्यारी बेला में,
मैं भी जगमगाया हूँ।

मेरे जलने से घर रोशन है,
मेरे जलने से मन रोशन है।
मैं मिट्टी का छोटा-सा दीपक,
पर आज सितारों से भी प्यारा हूँ।

मैं दिवाली का दिया हूँ,
मैं छोटा-सा दीपक हूँ।
थोड़ी देर ही जल पाऊँगा,
पर खुशियों की छाप छोड़ जाऊँगा।

न शोर से, न दिखावे से,
न ऊँची आवाज़ों के मेल से।
घर रोशन होता है प्यार से,
अपनों के मीठे व्यवहार से।

ईर्ष्या का अँधेरा मिटाओ,
नफ़रत की दीवार गिराओ।
एक दिया मेरे जैसा जलाओ,
एक दिया मन में भी जलाओ।

जहाँ प्रेम की ज्योति जलती है,
वहाँ खुशियों की बारिश होती है।
जहाँ मिल-जुलकर सब रहते हैं,
वहीं सच्ची दिवाली होती है।

आओ मिलकर दीप जलाएँ,
हर चेहरे पर मुस्कान सजाएँ।
कोई भी मन उदास न रहे,
हर घर में खुशियों के फूल खिलें।

मैं दिवाली का दिया हूँ,
प्यार का संदेश लाया हूँ।
अँधियारे से लड़ना सिखाता हूँ,
उम्मीद की किरण जगाता हूँ।

आज जलूँगा, कल बुझ जाऊँगा,
पर अपना संदेश छोड़ जाऊँगा।
याद रखना मेरी ये बात,
प्रेम से रोशन हो हर दिन और रात।

मैं दिवाली का दिया हूँ,
मैं खुशियों का संदेश हूँ।
मिट्टी का छोटा-सा दीपक सही,
पर प्रेम और प्रकाश का प्रतीक हूँ। 🪔

सुषमा बग्गा
रायपुर छत्तीसगढ़

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