(युवा शक्ति के सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व का प्रेरणा-गीत)
दीपों का त्योहार साथियो, आओ आज मनाएँ हम,
अज्ञान-अंधकार मिटाके, ज्ञान-ज्योति फैलाएँ हम।
ईर्ष्या-द्वेष मिटे मन से, प्रेम-सद्भाव जगाएँ हम,
नफरत की दीवारें तोड़ें, मानवता अपनाएँ हम।
ऊँच-नीच के भेद मिटाके, समता का विस्तार करें,
हर आँगन में प्रेम खिलाके, सुखी संसार बनाएँ हम।
दीपोत्सव में मन का मैल मिटाकर, नया उजास लाएँ हम,
जाति-धर्म के भेद भुलाकर, एक समाज बनाएँ हम।
युवा शक्ति का तेज जगाकर, नव निर्माण का काम करें,
श्रम, सेवा और त्याग भाव से, भारत का उत्थान करें।
शिक्षा का दीप जले हर घर में, ज्ञान का विस्तार हो,
नारी को सम्मान मिले, सबको समान अधिकार हो।
राष्ट्र-प्रगति के महायज्ञ में, अपना हाथ बढ़ाएँ हम,
नकारात्मकता के तिमिर को, मिलकर दूर भगाएँ हम।
जल, जंगल और जमीन बचाके, प्रकृति का सम्मान करें,
सत्य, अहिंसा और सद्भाव से, नवभारत निर्माण करें।
मानवता की राह पकड़के, जन-जन का कल्याण करें,
दीपों के इस पावन पर्व में, नवयुग का आह्वान करें।
दीप जले तो मन भी जागे, ऐसा अभियान चलाएँ हम,
दीपोत्सव के महा-संकल्प से, उज्ज्वल राष्ट्र बनाएँ हम।
— रवीन्द्र कुमार रतन
स्वतंत्र लेखन, जे.पी. सेनानी
हिन्दी, बज्जिका के कवि एवं साहित्यकार।
