घना तिमिर था, एक लौ काँपी थी,
मौन के भीतर, इक प्रार्थना जागी थी।
सब कुछ बिखरा था, आशा रूठी सी थी,
उसी टूटन से, किरण फूटी सी थी।
राहें उलझी थीं, कदम डगमगाए थे,
अधूरे सपने, नयनों में समाए थे।
भय भरा हृदय था, नयन भर आए थे,
फिर भी भीतर से, स्वर बोला – चले चलें।
करुणा का तेल बना, श्रद्धा की बाती बनी,
जली जो लौ, तो भ्रम की रात ढली।
एक छोटे दीये से, दिशा बदल चली,
अंधियारे ने मानी हार, उजाले की घड़ी चली।
अब मैं देह नहीं, मैं एक भाव हूँ,
न मैं रात हूँ, मैं ही प्रभात हूँ।
जिधर भी जाऊँ, वहीं प्रकाश हूँ,
अंधकार से निकल कर, मैं खुद ही प्रकाश हूँ।
ये लौ बुझे नहीं, यही प्रार्थना मेरी है,
हर बहन, हर साथी तक पहुँचे, यही कामना मेरी है।
हम जो कर्म छोड़ जाएँ, वही राह बने सबकी,
आने वाली पीढ़ी के लिए, नींव बने ये लौ सबकी।
-डॉ माया एस एच
