अनाथालय एवं वृद्धाश्रम की दिवाली

जब दीप जले सब के घर में, यह हाल अनाथ जनों मन में।
तज के जननी-पितु को सब ही, सुत मोद मनावत हैं घर में।

सब लोग हँसे घर मोद रचे, इन वृद्ध जनों मन सोक जमे।
न मिले सुख कोय न दीप बले, बस आँसु बहे दुख के नद में।

न हि कोय यहाँ सुनता दुख को, सब रोय कटे दिन रैन इहाँ।
शिशु रोवत हैं बिन मात पिता, बुढ़हूँ रहते बिन लाल जहाँ।

जग में उजियार भयो सब में, पर ये जन तो तम बीच रहे।
नहिं कोउ सुने इन की बतियाँ, दुख का नद है इन बीच बहे।

शिशुकाल गया बिन मात पिता, बुड़हूँ तड़पें तज लाल जहाँ
सब ओर उजास भया जग में पर ये जन बैठ अँधेर यहां।

इन बाल अनाथ कि-ओर तको, जिनके सिर हाथ न मात-पिता।
न हि वस्त्र मिले न हि अन्न मिला, बस रोवत हैं सब काल बिता।

सब खेलत हैं घर आँगन में, पर ये सुत बैठ उदास खड़े।
यह पर्व लगे इनको दुख सा जब दीप जले पर कष्ट बड़े।

अपने न तजो कब भी जग में, यह सीख सदा हिय बीच धरो
करके करुणा दुख दूर करो, इन जीवन में उजियार भरो।

सादर
मदन शास्त्री ‘धरैल’
नालागढ़ हिमाचल प्रदेश चलभाष 7018635651

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!