मन पर हो जीत तो रोज समझो दिवाली है
प्रेम का दिया जले, हृदय का तम खाली है
अप्प दीपो भव को सार्थक बनाना जरूरी
दीपोत्सव पर्व में रंगोली तो रंग निराली है
माटी का दिया, दीपक का अस्तित्व निराला
सत्य अहिंसा प्यार का मन जब हो मतवाला
नारी सम्मान हो, मिटे ना पुरखों का संस्कार
ऐसा दीप जले,हम हो मानवता का रखवाला
दीपक खुद जलकर, जगमग करता है संसार
प्रकाश ज्ञान का फैले,मन का दीप जले हजार
मिटे भेदभाव, हो देशभक्तों का मन में सम्मान
जले ऐसा दीप,सत चित आनंद का हो त्योहार
सिर्फ घर नहीं, अंतर्मन रौशन करना है जरूरी
मन से रावण निकले, सबकी इच्छा होगी पूरी
कोई रहे ना लाचार,ना हो किसी पर अत्याचार
जले ऐसा दीप,छिने ना किसी की आभा सिंदूरी
नफरत हटे,फैले जग में प्रेम और भाईचारा
मन में हो राम तो घोर अंधकार भी है हारा
करो प्रकृति का संरक्षण,ना फैले प्रदूषण
जले ऐसा दीप, राम की मर्यादा हो हमारा
सुबोध कुमार दास ‘मधुपति’
मधुबनी, बिहार
