डॉक्टर के शब्द रतन के कानों में अब भी गूँज रहे थे….
“अब ज्यादा समय नहीं है… आपका हृदय बहुत कमजोर हो चुका है। सावधानी रखिए… शायद यह आपकी आखिरी दीपावली……”
शब्द छोटे थे, लेकिन भीतर पूरी जिंदगी के बुझ जाने की आहट थी।
बेटे ने पिता का हाथ थामकर कहा…
“पापा! इस बार हम आपको शहर के सबसे बड़ेअस्पताल में ले जाएंगे वाहाँ सारी सुविधाएँ हैं, अच्छे डॉक्टर हैं… आपकी सेहत के लिए बेहतर होगा”…….
रतन ने बेटे के चेहरे पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा….
“बेटा! इस बार अस्पताल नहीं… मुझे अपने गाँव के घर में दीपावली मनानी है!… जीवन की संध्या में अपने गाँव की मिट्टी, अपने लोगों और अपने आँगन के दीयों के बीच रहना चाहता हूँ……”
बेटे ने पिता की इच्छा के आगे सिर झुका दिया।
गाँव के अतिम छोर पर एक छोटी-सी झोपड़ी थी। उस झोपड़ी में बिरजू अपनी विधवा माँ और दो नन्ही बेटियों के साथ रहता था। गरीबी इतनी कि कई बार “चूल्हा भी बच्चों की भूख देखकर रो पड़ता था”…..
रतन प्रतिदिन उस झोपड़ी को देखते थे।
शाम होते ही वहाँ एक छोटी-सी ढिबरी जलती… उसकी काँपती लौ मानो अँधेरे से लड़ने का असफल प्रयास करती।
बिरजू की दोनों बच्चियाँ कभी स्कूल नहीं गई थीं। उनके हाथों में किताबों की जगह जिम्मेदारियों की छाया थी। आँखों में पढ़ने के सपने थे, लेकिन घर की गरीबी उन सपनों के सामने दीवार बनकर खड़ी थी।
वे सोचते!…..
“मेरे जीवन का सूरज डूबने को है… लेकिन इन बच्चों के जीवन में अभी तो सुबह भी नहीं हुई!”…….
दीपावली से एक दिन पहले रतन बैंक गए। कुछ रुपये निकाले और अपने पास रख लिए।
बेटे ने उनके लिए महँगी झालरें, पटाखे, सजावट और मिठाइयाँ खरीदी थीं। रतन ने सब वापस करवा दिया।
बेटे ने पूछा…..
“पापा! आपने सब वापस क्यों कर दिया?”
रतन मुस्कुराए…
“बेटा! इस बार दीपावली अपने घर में नहीं, किसी के जीवन में मनानी है……”
उन्होंने उन रुपयों से तीन साइकिलें, स्कूल की किताबें, कॉपियाँ, पेंसिलें, मिठाइयाँ और सौ मिट्टी के दीये खरीदे।
बेटे ने आश्चर्य से पूछा……
“पापा! तीन साइकिलें क्यों?”
रतन की आँखें नम हो गईं।
“ बिरजू की दोनों बेटियों के लिए… और तीसरी उस उम्मीद के लिए, जो उनके जीवन में अभी जन्म लेने वाली है।”
दीपावली की शाम…
लेकिन गाँव के उस अंतिम छोर पर आज भी अँधेरा पसरा था।
रतन!…. धीरे-धीरे बिरजू की झोपड़ी की ओर बढ़े। उनके हाथों में सामान था और आँखों में एक अनकहा सपना।
बिरजू की माँ ने उन्हें देखकर आश्चर्य से कहा….
“अरे बाबूजी! आप इस समय यहाँ? आइए… हमारे घर में तो आपके बैठने के लिए भी जगह नहीं है…”
रतन ने मुस्कुराकर कहा….I
“माँ! आज जगह नहीं, दिल बड़ा होना चाहिए। और तुम्हारा घर तो मेरे लिए सबसे बड़ा मंदिर है…”
उन्होंने मिट्टी के दीये निकाले।
एक दीया आँगन में……एक दीया चौखट पर……
एक दीया उस कोने में… जहाँ बच्चियाँ पढ़ेंगी…..
और एक दीया उस अँधेरे में, जहाँ वर्षों से उम्मीद सोई हुई थी।
धीरे-धीरे पूरी झोपड़ी दीयों से जगमगा उठी।
बिरजू की माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
“बाबूजी! हमारे घर में तो कभी इतनी रोशनी नहीं हुई… आज ऐसा लग रहा है जैसे भगवान स्वयं हमारे घर उतर आए हों!…..”
रतन ने काँपते हाथों से दोनों बच्चियों को अपने पास बुलाया।।
उनके सामने साइकिलें रखीं, किताबें दीं, मिठाइयाँ दीं और सिर पर हाथ फेरकर कहा…
“बेटियों! अब तुम स्कूल जाओगी, खूब पढ़ोगी… खूब आगे बढ़ोगी, तुम्हारे जीवन में अब अँधेरा नहीं रहेगा…”
एक बच्ची ने मासूमियत से पूछा..
“दादाजी! ये सब हमारे लिए क्यों?”
रतन कुछ क्षण मौन रहे….
फिर उनकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े।
उन्होंने बच्ची को सीने से लगाकर कहा…
“बेटी! जब जिंदगी का अपना दीया बुझने लगे, तब किसी और के जीवन में उजाला कर देना चाहिए। यही मनुष्य होने का सबसे बड़ा सुख है।”
वह रोशनी थी एक गरीब की झोपड़ी में…
वह रोशनी थी दो बच्चियों की आँखों में…
वह रोशनी थी एक बूढ़े पिता के हृदय में…
और वह रोशनी थी मानवता की।
रतन की आँखें नम थीं। शरीर थका हुआ था। हृदय कमजोर था। लेकिन चेहरे पर एक अद्भुत शांति थी।
रतन ने आसमान की ओर देखा।
दीयों की लौ में उन्हें अपनी पूरी जिंदगी दिखाई देने लगी।
शायद जीवन की अंतिम दीपावली थी…
क्योंकि उन्होंने अपने बुझते हुए दीये से किसी और के जीवन की लौ को प्रज्वलित कर दिया था।
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डॉ. राम रतन श्रीवास ‘राधे राधे’
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
