रामवीर अहलावत
प्रवक्ता (इतिहास), रा.बा.व.मा. विद्यालय नं. 1, टीकरी कलां, दिल्ली – 110041
अमावस की काली चादर पर,
जब दीप सितारे बन जाते हैं,
हर घर-आँगन की देहरी पर,
उम्मीद के फूल खिल जाते हैं।
मिट्टी के नन्हे दीपक में,
जब नेह का तेल उँडेला जाता है,
तब अंधकार का घना साम्राज्य,
पल भर में ही हिल जाता है।
राम लौटे थे वनवास से जब,
अयोध्या ने पलकें बिछाई थीं,
सरयू के तट पर दीपमालिका,
सत्य की जीत की गवाही थी।
धर्म की जय, अधर्म की हार,
यही दीपों का संदेश है,
जो सच के पथ पर चलता है,
उसके हिस्से सदा प्रकाश शेष है।
रंगोली के रंगों में बसती,
अपनेपन की मीठी बात है,
मिठाई की मिठास में घुलती,
रिश्तों की सौगात है।
बच्चों की किलकारी गूँजे,
फुलझड़ियाँ मुस्काती हैं,
माँ के हाथों की थाली में,
लक्ष्मी-पूजन की बाती है।
पर एक दीप उस द्वार पर भी,
जहाँ अभी तक अँधियारा है,
बाँटो खुशियाँ, बाँटो उजियारा,
यही पर्व का सार हमारा है।
न हो बारूद का शोर कहीं,
न धुएँ से घुटे ये आकाश,
स्वच्छ रहे धरती, स्वच्छ पवन,
यही हो दीपोत्सव का विश्वास।
मन के भीतर जो तम छाया हो,
द्वेष, अहंकार, अज्ञान का,
उसे जला दें ज्ञान-ज्योति से,
यही सच्चा दीप है सम्मान का।
आओ मिलकर दीप जलाएँ,
भारत का गौरव बढ़ाएँ,
एकता, प्रेम और भाईचारे से,
हर हृदय को रोशन कर जाएँ।
शुभ दीपावली! 🪔
