इस वर्ष की दीपावली आ गई है,
तन मन का अँधेरा पहले मिटाओ,
बाहर तो दीप हजारों जलते हैं,
भीतर का दीपक पहले जलाओ।
घर आँगन को तो सजाते हो सब,
मन के आँगन को पहले सजाओ,
कपड़ों की सिलवट मिटाते तो हो,
मन की सिलवट पहले मिटाओ।
मिठाई बाँटते हो सारे जग को,
प्रेम की मिठाई तो पहले बाँटो,
पटाखों से नभ गूँजता है सारा,
मन के अहं को पहले भगाओ।
लक्ष्मी पूजा करते हो घर-द्वार,
कर्म की लक्ष्मी पहले जगाओ,
राम आए हैं अयोध्या लौट के,
अपने मन में राम पहले बसाओ।
अँधेरा चाहे कितना भी गहरा हो,
एक दिया काफी है मिटाने को,
आदित्य कहे दीप पर्व यही है,
खुद से खुद को पहले मिलाओ।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ
