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सहयोग सोसाईटी में आनंद शर्मा और अनिल चतुर्वेदी पास पास में रहते थे । दोनों जिगरी दोस्त थे । दोनों की दोस्ती देखकर पडोसी लोग ईर्ष्या से जलते थे ।
दीपावली के त्योहारों में पाँच दिन पहले ही सोसाईटी रंगीन ईलेकट्रीक लेम्प की रोशनी से चमक रही थी । घर-घर दीपक जलाया जा रहा था ।
दीपावली के दिन सुबह में आनंद शर्मा की बेटी आंगन में सुशोभित रंगोली सजा रही थी । तब अनिल चतुर्वेदी का लडका उस के आँगन में पौधाओं को पानी सींच रहा था, उस ने शरारत करके को रंगोली सजा रही लडकी की तरफ पानी की पाईप को रखकर पीचकारी से पानी रंगोली पर छिडका । पानी से रंगोली बिगड गई । यह देखकर बेटी रोने लगी । बेटी की मम्मी शीतल बेटी की रोने की अवाज सुनकर घर से बाहर आयी । बेटी ने बिगडी हुई रंगोली दिखाई और यह शरारत अनिल चाचा के पुत्र ने की है, ऐसी शिकायत की । शीतल ने लडके को बहुत डाँटा और पीटा ।
लडके ने घर में जा करअपनी मम्मी को सभी बात सुनाई । बस, यही छोटी सी बात में दोनों परिवार के बीच हंगामा हो गया । बात मारामार पर्यंत पहोंच गई । पडोसी लोग तमाशा देखने के लिऐ एकत्र हो गये ।
कोई तो प्रसन्न हो कर बोलने लगे - 'अच्छा हुआ, ये दोनों बहुत आकाश में उडते थे, अंत में गिर गये । अब देखने योग्य बात बनेगी ।'
अचानक दोनों के मन में अच्छा विचार प्रगट हुआ । "दो बिल्ली एवं एक बंदर" की पंचतंत्र की कहानी याद आयी । दोनों परिवार के बीच लंबे समय से चली आ रही घनी दोस्ती दृष्टि समक्ष छा गयी । क्रोध पिघल गया दोनों ने आलिंगन दिया और हँसते हुए अलग हो कर अपने-अपने घर चले गये ।
पडोसी लोग तो यह देखकर अचंभा में पड गये । एक ने तो कहा भी - ' यह तो नाटक था नाटक ।'
- भूपेन्द्र त्रिवेदी ‘स्वयंभू’
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