सहस्रार के नील-गगन में राम, धवल आदर्श-सा,
मूलाधार की श्याम-धरा पर सीता, मौन-उत्कर्ष-सा!
बीच हृदय का अनाहत स्वर, बिना जला, बिना बुझा,
अग्नि-परीक्षा नहीं, प्रेम-सेतु था अनसुझा!
सीता ज्वाला नहीं, ज्वाला की आद्य-शिखा, स्वयं-प्रभा,
रावण-कर ने छुआ छाया को, छू सका न प्रभा!
अग्नि से कहाँ निकलना था उसे, जो अग्नि-स्वरूपा थी,
राम को आना था हृदय तक, मर्यादा से ऊपर उठी!
पर राम रहे सहस्रार में ही, लोक-लाज के शास्त्र में,
सीता लौटी धरा-गर्भ में, मौन-व्यथा के पात्र में!
आज दीपावली फिर आई, जगमग अयोध्या-द्वार है,
पर हृदय के निभृत-आले में एक दीप अभी उदास है!
जला सको तो इस बार तुम अनाहत में एक दीप जला दो,
सहस्रार से मूलाधार तक हृदय का सेतु बना दो!
तभी दीपावली सार्थक होगी, तभी राम घर आएंगे,
धरा-गगन के बीच हृदय में जब दोनों मुस्कुराएंगे!
नाम : संगीता जड़िया
पद : सृजन सारथी / संस्कार न्यूज़
शहर : अजमेर
मोबाइल नंबर:9414006311
