क्यूँ न इस दिवाली नव संकल्प संधान करें,
अंतर्मन के सुप्त भावों का पुनर्निर्माण करें,
केवल देहरी पर क्यूँ हो दीपमालिका सजी,
स्वयं के चेतना के आंगन में भी आलोक जगाएं।
याद करें प्रभु राम को, मर्यादा के पावन नाम को,
काष्ठ के रावण को जला कर क्या ही असर हो,
जब अंतस में बैठा दशानन अब भी शांत नहीं,
क्यों न अहंकार, द्वेष, दंभ का संहार करें,
अपने भीतर के रावण का भी तिरस्कार करें।
चलो इस दिवाली , एक दीप उस सुने आँगन जलाएं,
जिसने देश की रक्षा की खातिर अपना लाल गंवाया ,
उस माँ के सूने नयनों में फ़िर नव उजियारा भर जाएं ,
उस सूने परिवार के जीवन में खुशी के दीप जलाएं।
एक दीप आशा की उस सूने आँगन में भी जलाएं ,
जहां नारी के सम्मान को ठुकराया जाता है,
अस्मिता के प्रश्न पर समाज मौन हो जाता है,
जहां न्याय को पाने में मनुष्य बरसों नींद गवांता है,
चलो नारी के सम्मान को फिर अधिकार दिलाएं,
उनके जीवन में फिर सुरक्षा के आशा दीप जलाएं।
एक दीप उन सूने गलियारों में भी जलाएं ,
जहां मजहब के नाम पर इंसान बांटे जाएं,
जहां रक्तरंजित धरा पर नफरत के व्यापार हों,
क्यूँ हम मनुष्यता से बड़ा कोई धर्म बनाएं,
आओ सद्भाव के सेतु से हृदय दीप जलाएं।
एक दीप उस जीर्ण कुटी के द्वार जलाएं,
जहां अभावों के अंधियारे ने हों पग फैलाएं,
जहां क्षुधातुर नयनों ने हों पकवानों के स्वप्न सजाएँ,
उन वंचित अधरों पर मुस्कान प्रसून खिलाएं,
उन असहाय के जीवन में पुनः आशा का प्रभात लाएं।
क्यूँ न अपने अंतस की मलिनता का परिमार्जन करें,
उर अंतस के द्वेष, दुराग्रह और विद्वेष का विसर्जन करें,
करुणा, मैत्री , समरसता को जीवन का सार बनाएं,
इस दिवाली, मानवता का मंत्र जन- जन तक पहुंचाएं।
इस बार दीपोत्सव का कुछ नया अर्थ गढ़ जाएँ,
निष्प्राण परंपराओं में संवेदना के प्राण जगाएं,
दीयों की लौ से कलुषित तिमिर मिटाएं,
बुझते जीवन में प्राणित स्पंदन दीप जलाएं।
इस दिवाली क्यूँ न कुछ नया आजमाएं।
प्रियंका तिवारी “वाणी”
