मिट्टी का चराग़ हूँ मैं,
अभी उजाला मुझमें बाक़ी है,
ज़माने के घने अँधेरों से
जंग निरंतर मेरी जारी है।
फ़क़त मकानों की देहरी पर
दीपमालिका न सजाओ,
दिल में जमी जो भावशून्यता है,
उसे भी रुख़्सत कर जाओ।
जहाँ आज भी भूखी निगाहें
एक निवाले की आस तकती हैं,
जहाँ मुफ़लिसी की साँसें भी
ख़ामोश अँधेरों में सिसकती हैं।
आओ, इस जश्न-ए-चराग़ाँ पर
कुछ पैग़ाम नया दे जाएँ,
नफ़रत और अदावत की दीवार गिराकर
तम के हर निशाँ को मिटाएँ।
इल्म का चराग़ जले,
तिमिर अज्ञान का मिट जाए,
प्रेम की चमकती रोशनी से
दिल का हर कोना जगमगाए।
जब तक तकती आँखों में
उम्मीद का उजाला बाक़ी है,
तब तक भारत की आत्मा में
दीपोत्सव की झाँकी बाक़ी है।
लेखिका– .डॉ.नीलम सरोज ‘खुशबू’
