दीपावली
एक दीप देहरी पर, एक दीप अंतःकरण में…
दीप जलाना सरल बहुत है,
पर स्वयं दीप बनना कठिन है,
घर का तम तो मिट जाता है,
मन का तम मिटना कठिन है।
दीवारों से धूल हटाई,
आँगन का हर कोना सँवारा,
किंतु कभी यह भी सोचा है,
कितना निर्मल है मन हमारा?
वर्षों से जो द्वेष संजोया,
उसका भी परिमार्जन कर लें,
घर की वस्तुएँ बहुत सँभालीं,
कुछ अपना अंतर्मन भी सँभाल लें।
एक दीप आत्मबोध का जलाएँ,
जो स्वयं से परिचय कराए,
दूसरों के दोष गिनने से पहले,
अपना वास्तविक स्वरूप दिखाए।
एक दीप आत्मविश्वास का हो,
जो संकट में भी अडिग रहे,
परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों,
मन अपने संकल्पों पर दृढ़ रहे।
एक दीप संतोष का जलाएँ,
जो तृष्णाओं का अंत करे,
जो प्राप्त है, उसका आदर हो,
जो अप्राप्त है, उसका मोह हरे।
एक दीप ईर्ष्या के अंधकार में,
जो पराई उन्नति पर हर्ष जगाए,
किसी और का प्रकाश देखकर,
अपना दीप कभी न बुझाए।
क्यों तुलना करें किसी से अपनी?
हर जीवन की अपनी गति है,
सूर्य, चंद्रमा, तारे सब भिन्न हैं,
फिर भी सबकी अपनी ज्योति है।
एक दीप सकारात्मक चिंतन का,
जो निराशा में आशा भर दे,
असफलताओं से विचलित न होकर,
नवसृजन का साहस भर दे।
एक दीप प्रेम का जलाएँ,
जिसमें कोई स्वार्थ न हो,
संबंधों में अपनत्व रहे,
अधिकारों का अनावश्यक भार न हो।
एक दीप क्षमा का भी जलाएँ,
मन के पुराने घाव भरें,
जिनसे कभी मतभेद हुए हों,
उनके प्रति भी सद्भाव धरें।
एक दीप माता-पिता के नाम,
जिनसे जीवन का आरंभ हुआ,
जिनके त्याग और तप के कारण,
हमारे सपनों का उद्भव हुआ।
उनके चरणों में दीप रखकर,
केवल श्रद्धा व्यक्त न करें,
उनकी सेवा को धर्म समझकर,
जीवन में उसका निर्वहन करें।
एक दीप अपने अग्रजों के नाम,
जिनके अनुभव जीवन का सार हैं,
उनका सम्मान केवल परंपरा नहीं,
हमारे संस्कारों के आधार हैं।
एक दीप अनुशासन का जलाएँ,
जो जीवन को मर्यादा दे,
समय, संयम और कर्तव्यबोध से,
हर कर्म को सार्थकता दे।
एक दीप प्रकृति के नाम,
जिससे जीवन का अस्तित्व है,
नदियों, वनों और वायु के संरक्षण में,
हम सबका सामूहिक उत्तरदायित्व है।
कैसा उत्सव, कैसी प्रसन्नता,
यदि प्रकृति ही पीड़ित हो जाए?
दीपों से जगमग धरती हो,
पर आकाश धुएँ से भर जाए!
एक दीप मौन का भी जलाएँ,
जो भीतर का कोलाहल हर ले,
ध्यान की निर्मल अनुभूति में,
चंचल मन को स्थिर कर दे।
एक दीप आध्यात्मिकता का हो,
जो अहंकार का आवरण हटाए,
देह से परे चेतना का बोध कराए,
और आत्मा को आत्मा से मिलाए।
क्योंकि मंदिर में दीप जलाने से पहले,
मन में करुणा का उदय आवश्यक है,
ईश्वर को बाहर खोजने से पहले,
अपने भीतर उतरना आवश्यक है।
राम का स्मरण केवल उत्सव नहीं,
उनके आदर्शों का अनुसरण भी हो,
सत्य, त्याग, धर्म और मर्यादा,
हमारे जीवन का आचरण भी हो।
रावण केवल लंका में नहीं था,
वह अहंकार का प्रतीक भी है,
और राम केवल अयोध्या में नहीं,
वह अंतःकरण के विवेक भी हैं।
जब-जब लोभ हमें विचलित करता है,
जब-जब क्रोध विवेक हर लेता है,
जब-जब अहंकार सत्य को ढकता है,
तब-तब भीतर का रावण जीवित होता है।
और जब सत्य का साहस जागता है,
जब करुणा का विस्तार होता है,
जब मर्यादा कर्मों में उतरती है,
तब भीतर राम का अवतार होता है।
इसलिए दीपावली केवल
राम के अयोध्या लौटने का उत्सव नहीं,
यह अपने भीतर खोए हुए
रामत्व को पुनः जगाने का अवसर भी है।
हम बाहर कितने दीप जलाएँ,
यदि भीतर अंधकार शेष रहे?
कैसा प्रकाश, कैसी दीपावली,
यदि मन में द्वेष और अहंकार शेष रहे?
दीपक का धर्म स्वयं जलना है,
और जलकर तम का नाश करना,
मनुष्य का धर्म स्वयं सँवरना है,
और अपने कर्मों से जग का कल्याण करना।
जब विचारों में पवित्रता होगी,
जब व्यवहार में विनम्रता होगी,
जब हृदय में प्रेम और करुणा होगी,
तब आत्मा में वास्तविक उज्ज्वलता होगी।
फिर प्रकाश केवल देहरी तक नहीं,
हमारे अस्तित्व में समा जाएगा,
हमारे विचारों और सत्कर्मों से,
समस्त विश्व आलोकित हो जाएगा।
न दीपों की संख्या से प्रकाश मापें,
न वैभव से उत्सव की पहचान करें,
इस बार दीपावली कुछ ऐसी मनाएँ,
कि स्वयं के भीतर भी भगवान का सम्मान करें।
दीप जलाएँ, पर इतना स्मरण रहे,
प्रकाश का अर्थ केवल उजाला नहीं,
जहाँ ईर्ष्या नहीं, वहाँ प्रेम है,
जहाँ अहंकार नहीं, वहाँ विवेक है,
जहाँ तुलना नहीं, वहाँ आत्मस्वीकृति है,
जहाँ स्वार्थ नहीं, वहाँ करुणा है,
और जहाँ आत्मबोध है,
वहीं वास्तविक दीपावली है।
अजीत अनुराग !!
