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आज फिर आई है दीपों की रात,
लेकर खुशियों की सुंदर सौगात।
आँगन में दीपों की कतार सजी,
हर चेहरे पर मुस्कान नई।
माटी का दीपक कुछ कहता है,
अँधियारे में भी रोशन रहता है।
खुद जलकर जग को प्रकाश देता,
जीवन जीने का संदेश देता।
केवल घर में दीप जलाने से,
क्या अँधियारा मिट जाएगा?
जब तक मन में द्वेष रहेगा,
कैसे संसार मुस्काएगा?
आओ इस दीपावली पर हम,
नफरत की दीवारें तोड़ें।
जाति-धर्म के भेद भुलाकर,
प्रेम के रिश्ते फिर से जोड़ें।
किसी गरीब के घर भी जाकर,
खुशियों का एक दीप जलाएँ।
भूखे चेहरे की मुस्कान बनें,
किसी उदास हृदय को हँसाएँ।
नहीं चाहिए शोर पटाखों का,
नहीं चाहिए दिखावे की शान।
बस हर घर में खुशियाँ बरसें,
हर दिल में हो प्रेम का स्थान।
याद करें उन वीरों को भी,
जिनसे सुरक्षित अपना संसार।
उनके त्याग और बलिदानों से,
रोशन है अपना घर-परिवार।
लक्ष्मी आएँ हर घर-आँगन,
सरस्वती दें ज्ञान का दान।
गणपति दें सद्बुद्धि सबको,
खुशहाल रहे हिंदुस्तान।
एक दीप जलाएँ शिक्षा का,
एक दीप जलाएँ सम्मान का।
एक दीप जलाएँ मानवता का,
एक दीप जलाएँ हिंदुस्तान का।
आओ मिलकर शपथ ये लें,
हर दिल में उजियारा भर देंगे।
जहाँ कहीं भी दुख दिखाई दे,
वहाँ प्रेम का दीप धर देंगे।
दीपावली का अर्थ यही है,
जीवन में सद्भाव जगाना।
दीपों की इस पावन बेला में,
इंसान को इंसान बनाना।
दीप जलें तो ऐसे जलें,
हर दिल में विश्वास जगे।
दीपावली ऐसी मनाएँ हम,
कि मानवता का इतिहास बने l
डॉक्टर सुनीता प्रयाकर राव वासुनी, तेलंगाना
