एक दिवाली

क्षीर नीर से परी पूर्ण, यह अवनी अविनाशी है
विश्वपूजित धरा धाम जो, उज्जैनी और काशी है,
सत्य, शक्ति की गंध यहाँ, बालक बालक योद्धा है,
भारत का हर गाँव रामायण, हर घर एक अयोध्या है।।

हर आँगन है राम सुशोभित, सब आदर्श को जीते है,
पारिवारिक पीड़ा के रस को, जिम्मेदारी से पीते है,
परिजन के पोषण हेतु सब राम, वनवास को पाते है,
उन राम वियोग में सब दशरथ, जीते जी मर जाते है।।

वर्षों वन में बाधाओं से, वो खूब लड़ाई लड़ते है,
अपना पेट काट–काट कर, घर का पेट वो भरते है,
यौवन पूरा होम करके, अपना स्वाभिमान जलाते है,
तब जाकर नंगे पाँवों के नीचे, पुष्पक विमान आते है।

शत्रु को जो जीत लिए अब, साथी का साथ निभाना है,
सुग्रीव जटायु जो भी हों सबको गले लगाना है,
जीवन भर साध स्वयं को, जब सब बदहाली मिटाते है
तब जा कर घर में सुख की, वो एक दिवाली मनाते है।

संदीप सिंह गौतम

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