(आस्था, प्रेम, सद्भाव और मानवीय संवेदनाओं का आलोक-पर्व)
आँगन-आँगन ज्योति खिले, जगमग दीप जले,
मन के सूने कोने में, नव उल्लास पले।
तम की सारी बेड़ियाँ, उजियारे से टूटें,
सोए हुए अरमानों के, फिर से सपने फूटें।।
माटी के नन्हे दीपों में, जीवन का संदेश,
जलकर भी जो बाँटते हैं, उजियारे का परिवेश।
स्वार्थ मिटे, सद्भाव जगे, प्रेम की धारा बहे,
मानवता के पावन पथ पर, हर मन निर्भय रहे।।
किसी द्वार पर भूख न ठहरे, किसी नयन में नीर,
हर निर्धन के जीवन में भी, उतरे सुख की पीर।
सूनी आँखों में आशा का, एक सितारा दमके,
टूटे मन के आँगन में फिर, विश्वास का दीप चमके।।
रूठे रिश्ते जुड़ जाएँ, मिट जाए मन का द्वेष,
प्रेम-सुधा से सिंचित हो, धरती का परिवेश।
घृणा-दंभ के दुर्ग ढहें, करुणा का विस्तार हो,
हर मानव के हृदय में, मानवता का सत्कार हो।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ, मन का तम हरने को,
निज सुख की सीमा लाँघें, परहित में कुछ करने को।
एक दिया विश्वास का हो, एक प्रेम के नाम जले,
जब तक साँस शेष है अपनी, जगमग दीप जले।।
रचनाकार -संजय कुमार हिरवानी “हीरा
“जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़
