मंगल-पावन दीवाली का मिलजुलकर त्योहार मनाएँ ।
बाहर -भीतर अन्धकार को,दीप जलाकर दूर भगाएँ ।।
स्नेह-भाव का तेल डालकर, हर कुटिया को रोशन कर दें ।
ऐसे मधुरिम बाणी बोले, सबके मन की पीड़ा हर दें ।
अपनों-सा व्यवहार करें सब, खुशियों के उपवन खिल जाएँ।
बाहर -भीतर अन्धकार को, दीप जलाकर दूर भगाएँ ।।
प्रेम-भाव से अन्न खिलाकर,प्यास- क्षुधा सबकी जो हर दें ।
निर्धन-दुखियों की सेवा कर, जन मन को आनंदित कर दें ।
जाति-पाँति के भेद छोड़कर, बाँहों में भर कंठ लगाएँ ।
बाहर -भीतर अन्धकार को, दीप जलाकर दूर भगाएँ ।।
सब पाएँ साम्राज्य सुखों का होते आविष्कार जहाँ हैं ।
फिर कब हो पथ में अंधेरा कर प्रकाश विज्ञान वहाँ हैं ।
देश मुक्त हो तब दुष्टों से, वीर शस्त्र से देह सजाएँ ।
बाहर -भीतर अन्धकार को, दीप जलाकर दूर भगाएँ ।।
उन्हें मिले आरोग्य कि जो नभ, स्थल जल से भय दूर कराते।
जीव मात्र के प्रति करुणा हो, साथ चलें सब प्यार निभाते।
तन-मन से संपन्न सुखी हो ,ईर्ष्या का सब क्लेश मिटाएँ।
बाहर -भीतर अन्धकार को,दीप जलाकर दूर भगाएँ ।।
डॉ भावना सावलिया
आर्ट्स कॉलेज मोडासा
जिला-अरवल्ली
उत्तर गुजरात
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