ये है दिवाली जी,ये है दिवाली।
छायी है चारों तरफ़ खुशहाली।
ये है दिवाली जी, ये है दिवाली।।
सजी है अयोध्या, बहुत ही सुहावन।
नगर घाट लगते हैं, बहुत खूब पावन।
लगी दीप की पंक्ति, सबको लुभावन।
बरसता स्नेह,मेघ जैसे हों सावन।
सभी पूर्ण हैं, नहीं कोई खाली।
ये है दिवाली जी, ये है दिवाली।।1।।
राम के आगमन पर,सजी है अयोध्या।
ये लगती है प्यारी,सुहावन अयोध्या।
तीनों लोक से है, ये पावन अयोध्या।
सजी लगती है,मन भावन अयोध्या।
ज्यों लगता है, स्वर्गिक छटा इसने पा ली।
ये है दिवाली जी, ये है दिवाली।।2।।
आओ सब मिल,घर भी अपना सजायें।
अनुज राम -सीता, के यश -गुण को गायें।
लक्ष्मी -गणेश,धन के देवता बुलायें।
नगर -बाट -गलियों को, सुन्दर बनायें।
सभी सच्चरित्र हों,न कोई मवाली।
कवि “माहिर विचित्र” ,दे रहे खुशहाली।
ये है दिवाली जी,ये है दिवाली।।
कवि रचनाकार -राम मनोहर मिश्र “माहिर विचित्र”
विचित्रालय भिंडा मिश्र
पत्रालय -भाटपार रानी देवरिया उप्र 274702
