दीपावली को हम धन और श्रीराम के अयोध्या लौटने से जोड़कर देखते हैं, परंतु जैन परंपरा में इस पर्व का अर्थ अधिक गहरा है। जैन मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात को, ईसा से लगभग पाँच सौ सत्ताईस वर्ष पूर्व, बिहार के पावापुरी में चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था। बहत्तर वर्ष की आयु में उन्होंने कर्मों का क्षय करके देह त्यागी और सिद्ध अवस्था प्राप्त की।
कहा जाता है कि जिस रात्रि महावीर का निर्वाण हुआ, वह अत्यंत अंधकारमय थी। देवताओं ने उस अंधकार को दूर करने के लिए अनगिनत दीप जलाए। इसी परंपरा से दीपावली मनाने की शुरुआत हुई। यह दीप धन का नहीं, ज्ञान का प्रतीक था। महावीर के निर्वाण के पश्चात् उनके शिष्य गौतम स्वामी को अगले दिन केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इसलिए जैन समाज में दीपावली की अगली सुबह को केवलज्ञान दिवस और वीर निर्वाण संवत् के नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। पावापुरी में श्रद्धालु निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं।
महावीर का संदेश आज प्रासंगिक है। उन्होंने अहिंसा को परम धर्म बताया। अहिंसा केवल जीव हत्या न करना नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना है। उन्होंने सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के सिद्धांत दिए। अपरिग्रह अर्थात् आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना आज के भोगवादी युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अनेकांतवाद सिखाता है कि सत्य को एक ही दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। आज जब पर्यावरण संकट और हिंसा बढ़ रही है, तब महावीर का संदेश हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। दीपावली पर पटाखों और दिखावे के स्थान पर यदि हम एक दीप भीतर जलाएँ, क्रोध त्यागें, तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। निर्वाण उत्सव याद दिलाता है कि सच्ची दीपावली बाहर के दीपों में नहीं, भीतर के अंधकार को मिटाने में है।
आनंद कुमार जैन
खंडवा ,मध्य प्रदेश ,भारत
