दीप बन जाऊँ मैं, है तमन्ना मेरी,
जग में तम की कहीं भी न छाया रहे।
ज्ञान की लौ जले, दूर अज्ञान हो,
हर हृदय में उजालों का साया रहे।
दीप बन जाऊँ मैं, है मनोरथ मेरा,
न तिमिर की कहीं भी निशानी रहे।
राह भूले हुए को दिखाऊँ सदा,
ज़िंदगी ना किसी की वीरानी रहे।।
दीपमाला सजाऊँ सदा ही, गीत खुशियों के गाऊँ सदा ही।
साज बन जाऊँ मैं, आरजू है मेरी,
हर तरन्नुम में बस प्रेम पलता रहे।
भेद-भावों की दीवार ढहने लगे,
नेह नैनों में यूँ ही झलकता रहे।।
काम आऊँ मैं सबके सदा ही, दुःख मिटाऊँ मैं सबके सदा ही।
भाव बन जाऊँ मैं, बस यही ख्वाब है,
सत्य-निष्ठा की परिभाषा बनता रहूँ।
दर्द जिसका भी देखूँ पिघल जाऊँ मैं,
बन के करुणा की सरिता सा बहता रहूँ।।
दिल आवाज़ सुनकर डरूँ ना, सत्य के मार्ग से मैं हटूं ना।
राग बन जाऊँ मैं, ख्वाहिशें हैं यही, गूंजकर हर दिशा मैं गुँजाया करूँ।
स्वर्ग से भी सुहानी लगे भूमि यह, प्यार की छाँव सब पर लुटाया करूँ।।
रचना:
चरण सिंह प्रजापति ‘सीएस’
अध्यापक
हिण्डौन सिटी जिला- करौली राजस्थान
