दीप
दीप जलाकर मैं समझा आया
आँखों में ना लगे ये कह के आया।।
दीप जलाकर मैंने चंद्रमा को नमन किया
उनके समान मैं उजाला न कर पाया।।
दीप जलाकर मैंने खाना खाया
कोई भूखा ना सोये ये सहला के आया।
दीप जलाकर मैं रोने वाले के पास गया
उनके आंसू पोछे मैं दर्द छुपा के आया।।
दीप जलाकर मैं पड़ोस में गया
पड़ोस में लोग हँस नहीं रहे थे।
दीप जलाकर मैंने उन्हें उजाला दिया
एक दूसरे को देखा तो मुस्कुरा रहे थे।।
दीप जलाकर मैं मेहमान गया
चोर आए दरवाजे पर कुछ लिखा था ।
हमको धन नहीं खाना चाहिए
मां नहीं भूख लगी लिखा था।।
दीप जलाकर मैंने मां बाप के पैर छूए
आशीर्वाद दो जिससे मैं आगे बढ़ सकू।
दीप जलाकर मैंने पशुओं को देखा
आसूँ थे चारा दिया खुश कर सकू।।
कवि प्रवीण प्यासा पंड्या वसी डूंगरपुर राजस्थान
दी स्क्रीन राइटर एसोसिएशन विथ मुंबई
