दीप जले हर आँगन में, मेरा आँगन फिर सूना है,
हर घर से मिठाई आई, मेरे हिस्से बस दूना है।
जो हाथ मिलाते हैं सबसे, मुझसे आँख चुरा लेते,
मेरे होने से ही जैसे, अपनी दीवाली बचा लेते।
मैंने कभी किसी के देवता का अपमान नहीं किया,
हर धर्म की माँ को अपनी माँ सा माना, फिर क्यों ये सिला?
मैंने पूछा – “एक दीया मेरे हाथ से भी जल जाए,”
वो हँसे और कहा – “नास्तिक को दीया सजाने का क्या हक़?”
वो घूमते हैं, हँसते हैं, पकवान बाँटते हैं आपस में,
मैं दूर खड़ी देखती हूँ – कोई नहीं पूछता, “चल ना साथ में।“
मैंने कह दिया था – “मैं भी पैसे दूँगी, दीवाली साथ मनाएँगे,”
पर उन्होंने सुना भी नहीं – जैसे मैं इस दुनिया में ही नहीं आई।
मेरा दीया जलाने का मन करता है, रंगोली सजाने का,
माँ की तरह मिठाई बनाने का, दीवाली को अपनाने का।
पर हर दरवाज़ा बंद है, हर बुलावा बस रस्म है,
जैसे मेरा होना ही, उनके उत्सव से अलग है।
मैं ईश्वर से नहीं, इंसानों से डरती हूँ अब हर पल,
हर बार सोचती हूँ – क्या मेरी गलती बस यही है कि मैं इंसान हूँ?
मैंने धर्म नहीं, इंसानियत को अपना ईश्वर माना है,
क्या यही मेरी गलती है… क्या यही मेरी सज़ा है?
NABAM YAMI (Noona)
, ITANAGAR
Ganga, Itanagar,
State: Arunachal Pradesh
