दीपोत्सव हेतु गीत
ताल -कहरवा
बोल – एक ऐसा दीप जलाओ….
रचनाकार – युवा कवि आनन्द प्रकाश
एक पिता के सब बेटे हैं, ऐसा भाव जगाओ..।
एक ऐसा दीप जलाओ
नफ़रत का तिमिर मिटाओ रे
एक ऐसा दीप जलाओ।
अंतरा-1
मन मंदिर का कोना कोना चमक उठे सब तेरे।
डाह जलन ईर्ष्या के बादल कभी ना मन को घेरे।
अंतिम पक्ति के पिछड़े को निर्मल राह दिखाओ.. रे एक ऐसा दीप जलाओ… नफ़रत का तिमिर मिटाओ.. एक…।
अंतरा-2
जहाँ विकास की ज्योति न पहुंची, घेरा घोर अंधेरा।
नहीं कमाई, नहीं दवाई नहीं हैं रैन बसेरा।।
उसके संग कुटिया में जाकर उत्सव आज मनाओ….एक ऐसा दीप जलाओ नफ़रत का तिमिर मिटाओ।
अंतरा-3
मिट्टी दिया कपास की रुई, कपड़ा हों स्वदेशी।
घर में हीं पकवान बनाओ, खर्च करो ना बेसी।।
धर्म कर्म का बीज लगाओ, लक्ष्मी का फल पाओ.. एक ऐसा दीप जलाओ.. नफ़रत का तिमिर मिताओ।
अंतरा-4
हिया दिया में स्नेह कि बाती, प्रेम कि ज्योति जलाओ।
त्याग का तेल डालकर उसमें जीवन धन्य बनाओ।।
कहत आनंद द्वन्द्व तज मन का, ऊर आनंद बढ़ाओ।
एक ऐसा दीप जलाओ नफ़रत का तिमिर मिटाओ… रे एक ऐसा दीप जलाओ।
