अगणित दीपों के प्रकाश में, एक दीप स्वीकार करो माँ,
कर प्रकाश निज हृदयपटल पर,अंतर्मन के तिमिर मिटाएँ
मन के तम को करें पराजित, मानवता को गले लगाएँ ।
मिथ्या, मृषा, अनृत के तम को,सारे जग से आज हरो माँ,
अगणित दीपों के प्रकाश में, एक दीप स्वीकार करो माँ ।।
वनप्रिय सी वाणी दो हमको, एक दूसरे के पूरक हों,
सुख-दुख बाँटें जन आपस में, श्रेष्ठ संस्कृति के रक्षक हों ।
जो निर्धन हैं- भरे नेत्रजल, अभ्युदय-उद्धार करो माँ,
अगणित दीपों के प्रकाश में, एक दीप स्वीकार करो माँ ।।
स्नेहिल शील स्वभाव परस्पर, करुणा का आभूषण कर दो
भाँति-भाँति के पुष्प सुशोभित, कुसुमाकर सी धरणी कर दो।
भर दो नवल ज्योति जन-जन में, यह विनती स्वीकार करो माँ
अगणित दीपों के प्रकाश में, एक दीप स्वीकार करो माँ ।।
पुण्य वत्सला जन्मभूमि हित, अर्पित कर दें हम तन-मन-धन,
करो कृपा इतनी जगजननी, ले लें पुत्र सभी ऐसा प्रण ।
निज माटी से निर्मित दीपक- मेरा, अंगीकार करो माँ,
अगणित दीपों के प्रकाश में, एक दीप स्वीकार करो माँ ।।
✍️- डॉ नवीन जोशी “नवल”
दिल्ली
