दीपावली की गोधूलि वेला। बाजार रंग-बिरंगी रोशनियों, खील-बताशों की महक और खरीदारों की चहल-पहल से गुलजार था। संध्या दोनों हाथों में खरीदारी के भारी-भरकम थैले थामे, हांफती हुई मुख्य सड़क पर आई। कंधों पर लदे बोझ और दिनभर की थकान ने उसके पैरों की गति धीमी कर दी थी। सामने खड़े एक खाली ऑटो को देखकर उसने राहत की सांस ली और आवाज लगाई,
”भैया, पंचशील कॉलोनी चलोगे?”
ऑटो वाले ने सिर उठाकर देखा
और तत्परता से बोला, “हाँ मैडम जी, बिल्कुल चलेंगे। बैठिए।”
”कितने पैसे लोगे?” संध्या ने पर्स संभालते हुए पूछा।
”चालीस रुपये, मैडम।”
संध्या की भौंहें तन गईं। रोजमर्रा की मोलभाव करने की आदत तुरंत हावी हो गई, “इतनी सी दूर के चालीस रुपये? मैं तो रोज बीस रुपये में आती-जाती हूँ। सामान ज्यादा न होता तो मैं पैदल ही निकल जाती, सिर्फ इसीलिए आपको आवाज दी। सीधे-सीधे तीस रुपये दूंगी, चलना हो तो बताओ, वरना मैं दूसरा देखूं।”
त्योहार की शाम खाली हाथ लौटने का मलाल न रहे, यह सोचकर ऑटो वाले ने एक ठंडी सांस भरी और बेमन से कहा, “ठीक है मैडम जी… बैठ जाइए।”
संध्या ने सामान पीछे रखा और सीट पर बैठ गई। ऑटो अभी कुछ ही दूरी तय कर पाया था कि संध्या की नजर एक जानी-पहचानी दुकान पर पड़ी। उसने तुरंत कहा,
“अरे भैया! जरा एक मिनट ऑटो रोकना, मैं अभी आई।”
इससे पहले कि ऑटो वाला कुछ समझ पाता, संध्या तेजी से उतरकर बाजार की भीड़ में ओझल हो गई। करीब दो-तीन मिनट बाद जब वह लौटी, तो उसके हाथों में दो बड़े पैकेट और थे। यह सामान उसने दोपहर में ही पैक करवाकर रखवा दिया था ताकि लौटते वक्त साथ ले सके।
उसने इत्मीनान से वह सारा सामान भी ऑटो की सीट पर रख दिया। ऑटो वाला मुड़कर उसे देख रहा था। उसके माथे पर शिकन थी और आवाज में एक तल्ख गंभीरता, “मैडम जी, आपका इस तरह जाना कतई ठीक नहीं था।”
संध्या का पारा चढ़ गया। उसने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, “क्यों? इसमें गलत क्या है? कोई आधा घंटा तो नहीं लगा दिया, दो ही मिनट में आ गई। भीड़ ज्यादा थी इसलिए जरा देर हुई, वरना और पहले आ जाती। इतनी सी बात पर आपको एतराज क्यों है?”
ऑटो वाले ने बहुत सहज और संजीदा लहजे में कहा, “मैडम जी, एतराज इंतजार का नहीं है। बात यह है कि मुझ जैसे किसी गैर और अजनबी के भरोसे आप अपना इतना सारा कीमती सामान और पर्स छोड़कर चली गईं। कभी सोचा है कि अगर मैं बेईमान होता और आपका सामान लेकर रफूचक्कर हो जाता, तो आपका क्या होता? आज त्योहार की शाम आपका कितना बड़ा नुकसान हो जाता!”
उसकी यह बात संध्या के सीने में किसी तीर की तरह चुभी।
अजनबी चालक की इस निश्छल हिदायत ने उसे अवाक कर दिया। स्थिति को संभालते हुए और अपनी गलती पर पर्दा डालते हुए उसने चेहरे पर मुस्कान लाकर कहा, “अरे भैया, मुझे आपकी नीयत पर पूरा भरोसा था, तभी तो सामान छोड़कर गई। इंसान की सूरत देखकर उसकी नीयत भांप लेती हूँ मैं।”
यह सुनते ही ऑटो वाले के होंठों पर एक फीकी, दर्द भरी मुस्कान उभर आई। उसने धीमे स्वर में कहा, “अगर ऐसी बात थी मैडम जी, तो फिर आज के दिन हमसे वह दस रुपयों का मोलभाव क्यों किया? आज तो दीवाली है। वो दस रुपये आप हमें खुशी से दे देतीं, तो हमारे घर भी त्योहार की थोड़ी सी मिठास और बढ़ जाती।”
यह शब्द संध्या के दिल पर सीधे चोट कर गए। उसके पास कोई दलील नहीं बची थी। आत्मग्लानि और पश्चाताप ने उसके भीतर की कंजूसी को एक पल में धो दिया। उसने भरभराई आवाज में कहा, “भैया… अगर ऐसी बात है, तो आज आप तीस नहीं, पूरे पचास रुपये लेना।”
इतना सुनते ही ऑटो वाले का मुरझाया हुआ चेहरा खिल उठा। उसकी आंखों में एक ऐसी चमक कौंध गई, जिसे शब्दों में बांधना मुमकिन न था। उसकी उस भोली खुशी को देखकर संध्या के भीतर भी एक अपार सुकून की लहर दौड़ गई।
पंचशील कॉलोनी पहुँचकर अमूमन सभी ऑटो वाले सवारियों को मुख्य सड़क पर ही उतार देते थे, जहाँ से गलियों का फासला पैदल ही तय करना पड़ता था। लेकिन आज वह ऑटो वाला बिना कहे संध्या को सीधे उसके घर के दरवाजे तक लेकर गया। उसने एक-एक करके सारा सामान खुद उतारा और मुस्कुराते हुए बरामदे में सलीके से रख दिया।
संध्या ने उसे आदरपूर्वक रोका, गरम चाय-नाश्ता कराया और हाथ में पचास का नोट थमाते हुए विदा किया।
ऑटो की आवाज जब दूर जाकर शांत हो गई, संध्या वहीं देहरी पर खड़ी सोचती रह गई।
महज बीस रुपयों की खातिर, बुझे मन से ऑटो का स्टीयरिंग थामे उस मजदूर के भीतर कैसा उत्साह और सकारात्मक उजाला भर गया था!
वे बीस रुपये उसके अपने बटुए के लिए शायद बहुत मामूली थे, किसी गैर-जरूरी खर्च की तरह, लेकिन उस मेहनतकश के लिए वे दीवाली की रात अपने बच्चों की थाली में एक अतिरिक्त मिठाई और घर के आंगन में एक नया दीया जलाने की सामर्थ्य थे।
किताबों में पढ़ी वह बात आज संध्या के अंतर्मन में सच बनकर उतर आई थी—दीपावली का असली उजाला सिर्फ अपने घरों को सजाने में नहीं, बल्कि किसी अभावग्रस्त चेहरे पर मुस्कान की रोशनी बिखेरने में है।
आज उसने कोई बहुत बड़ा दान नहीं किया था, लेकिन मोलभाव से ऊपर उठकर जो संवेदना उसने बांटी थी, उसने संध्या के हृदय को एक ऐसी पवित्र तृप्ति से भर दिया था जो किसी भी बाजार में खरीदी नहीं जा सकती थी।
लेखक :- डॉ भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
मोबाइल नंबर :- 9917717757
