उन रुढ़िताओं की,
जिन्होंनेघोंटा है गला,
कई कई बार मानव जाति का।
कहीं घुट रही स्त्री,बस स्त्री होने के कारण।
कहीं घुट रहा लड़का,बस दलित होने के कारण।
दलित नहीं, दमित कहो
किया गया है दमन उसका,
सिर्फ जाति के नाम पर।
मर रहा है बाप दहेज देने के लिए ।
हो गई हैं झुर्रियां माथे पर,
उम्र भर की कमाई,
लगानी होगी बेटी के ब्याह पर।
ब्याह नहीं, व्यापार कहो,
हो रहा है व्यापार ब्याह के नाम पर।
आओ जलाएं दीप,बाहर नहीं अपने भीतर।
मिटाएं कुरीतियों के अंधकार।
करें प्रकाशमय कई चेहरे।
जिनसे बचेगी मानवता,
और मानव जाति भी।
नाम –स्वर्णिमा गुप्ता
रायबरेली उत्तर प्रदेश
