01
दीपक से बाती कहे, मत करना अभिमान।
जलने का ही अर्थ है, देना नया विहान॥
02
अँधियारे की उम्र क्या, दीप जले जब एक।
सदियों की चुप्पी मिटे, सत्य अकेला नेक॥
03
माटी ने दीपक गढ़ा, लौ ने दिया प्रमाण।
लघु काया में भी बसे, विराटता के प्राण॥
04
दीपक होना सीखिए, सूरज होना छोड़।
छोटे-छोटे नेह से, जग के तम को तोड़॥
05
रोशन केवल घर नहीं, रिश्तों का संसार।
मन की चौखट पर रखो, थोड़ा-सा सत्कार॥
06
जिसने पीड़ा बाँट दी, वही सही धनवान।
मन की यही दीपशिखा, करती जग कल्याण॥
07
दीवाली तब मानिए, जब बदले व्यवहार।
मन के भीतर खिल उठे, संवेदन के द्वार॥
08
खाली हाथ न लौटने, पाए कोई द्वार।
ऐसी लक्ष्मी पूजिए, जिसमें हो उपकार॥
09
बुझते दीप बचाइए, आँधी को मत कोस।
किसी अकेले मन तलक, बनकर पहुँचो ओस॥
10
दीपक की लौ पूछती, कितना हुआ उजास।
कितने मन निर्भय हुए, कितने आए पास॥
डॉ. रागिनी स्वर्णकार शर्मा, इंदौर
