पंचपर्व में संस्कारों की अक्षय ज्योति समाई ,
दीप के पंचतत्त्वों में जीवन-दर्शन की गहराई ।
धनतेरस में दीये-सा समृद्धि का आधार,
संपदा के संग विवेक हो, वैभव में परोपकार।
कनक से पहले अंतर्मन कुंदन-सा निखर जाए,
समृद्धि का प्रत्येक कण परमार्थ में ढल जाए।
नरक चतुर्दशी में बाती-सा आत्मशोधन का संस्कार,
मन के समस्त कलुष धुलें, हो चेतना का परिष्कार।
विचारों में निर्मलता खिले, आचरण उज्ज्वल हो,
अहंकार के तिमिर से मुक्त अंतर्मन निष्कलुष हो।
दीपावली में घृत-सा स्नेह और आत्मीयता का संचार,
अमावस की नीरव निशा में दीपशिखाओं का विस्तार।
हर देहरी ने अपने हिस्से का आकाश सजाया,
हर आँगन ने बिछड़े अपनों को फिर पास बुलाया।
मन के मतभेद मिटें, संबंधों में माधुर्य घुले,
रूठे हृदयों के बीच फिर विश्वास के दीप जले।
गोवर्धन में लौ-सा प्रकृति के प्रति कर्तव्यबोध जगे,
धरा के अनंत उपकारों का कृतज्ञ भाव अंतस में जगे।
भाई दूज में प्रकाश-सा आत्मीयता का विस्तार,
स्नेह, विश्वास और अपनत्व से महके संसार।
दीया बने समृद्धि, बाती बने समर्पण की पहचान,
घृत बने सद्भावना, लौ बने कर्म की उड़ान।
आलोक बने अंतस में करुणा का अक्षय विस्तार,
पंचपर्व की ज्योति से सृजित हो मानवता का नव संसार।
आशना सोनी
जोधपुर
