स्वयंभू

त्रिनेत्र धारी शीश पर, हैं गंग को धारण किये ।
कंठाहार सर्प का, हैं गरल को पिये हुये।।
स्वयंभू अस्तित्व का,पार कौन पा सका।
भूत प्रेत साथ में,भस्मी तन मले हुये।।

      भूत प्रेत साथ---------

सृष्टि के निर्माण में, है पुण्य प्रताप आप का।
जगत पिता हो तुम्हीं, है सार भवानी मात का।।
सृजन पालक नाश के,विधान रूप स्तम्भ हो।
डोर हाथों आपके,प्रकृति चाल कुचाल का।।

   डोर हाथों आपके -----

लिंग रूप अपने, है मर्दन किया दंभ का।
देवाधिदेव प्रशस्त किया, है धर्म पथ विस्तार का।।
देव दनुज मानव सदा,आप ही के आश्रित।
नटराज योग महिमा को,त्रिलोक कण गाये सदा।।

     नटराज योग ---------

आभास ध्यान में रहे,हे आपका प्रभु सदा।
सत्यधृत कृपा करो, है करबद्ध विनती प्रार्थना।
विधर्मियों के नाश को, रौद्र रूप धारण करो।
सनातनी रक्षित रहें,हो आपकी अनुकम्पा सदा।।

   विधर्मियों के नाश -----
   सनातनी रक्षित रहे ----

प्रमोद कुमार “सत्यधृत “
पिनगवां (नूँह) हरियाणा

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