एक दीप अपने भीतर भी


इस दीपावली घर की सफ़ाई करते हुए,
कुछ पुरानी यादें भी हाथ लगीं।
कहीं बचपन की हँसी छिपी थी,
कहीं अपनों की अधूरी बातें मिलीं।
दीवारों से धूल तो हटा दी,
पर मन की कुछ शिकायतें रह गईं।
खिड़कियों पर झालरें सजा दीं,
पर रिश्तों में कुछ दूरियाँ रह गईं।
सोचा, इस बार कुछ अलग करूँ,
केवल घर नहीं, मन भी साफ़ करूँ।
जिससे वर्षों से बात नहीं हुई,
उसके दरवाज़े पर दस्तक दूँ।
किसी की गलती को माफ़ करूँ,
अपनी गलती भी स्वीकार करूँ।
मिठाइयों के साथ थोड़ा अपनापन,
और शुभकामनाओं में सच्चाई भरूँ।
शाम हुई, दीपक जलने लगे,
आँगन रोशनी से भरने लगा।
एक पुराना रिश्ता फिर मुस्कुराया,
और बिना दीप के एक कोना जगमगाया।

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