अबके बरस फिर से
वही उत्साह उमंग सजी
खुद को तलाश करती
दिखी दीपों की कतार….
आओ इन्हें अपने से
आंखों में सहेज बसायें
यह बनता असर देख
दीपमाला की हर लौ
जीवन से वादा करती
अपने महसूस होने लगी….
यह नजारा देख कर
ऐसा आभास होने लगा
अपना बनता असर लिए
आसपास घिरे नजर आते
घने लगते तमस को
अपने धकेलने की चाह
में हर दीपक सजी
लौ झूमकर इतराते दिखी….
इस पल मिला एहसास
सबके मन का डर
हरता हुआ अपने लगा…
इसी तरह अपने बनी
अपनत्व की खुली चादर
दिलखुश कर भाने लगी…
अविरल ठिठुरन संग लेकर
तन छूती बहकी बयार
शीत का साहस अपने
अंतरंग सफर की डगर
इधर से उधर जाकर
रात सुहानी करने लगी…
नील गगन हुआ मगन
सितारों की ओझल महफिल
में खोया अपने दिखा….
सबका मन हरने यहां
फिर वही पुरानी रीति
दीपों का श्रृंगार किए
अपने नई प्रीति निभाने
दीपज्योति से फिर जगमग
करने अपने आई दीपावली….
श्रीमती निशी श्रीवास्तव ठाणे मुम्बई
