दीपावली पर गाय गोहरी : आदिवासियों की आस्था का पर्व

        दीपावली पर गाय गोहरी आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और प्रकृति प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी, रतलाम और खरगोन जैसे मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों के साथ-साथ पड़ोसी राज्य गुजरात के दाहोद जिले में भी दीपावली का असली उत्सव लक्ष्मी पूजन कर मनाई जाने वाली गाय गोहरी से ही शुरू होता है, क्योंकि आदिवासी समाज के लिए गाय केवल पशु नहीं, बल्कि माता, धन-लक्ष्मी और जीवन का आधार है। साल भर गाय और बैल खेतों में हल जोतकर, अनाज पैदा कर और दूध देकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं, इसलिए दीपावली पर उनका सम्मान करना इस समाज का पवित्र धर्म माना जाता है। आदिवासी संस्कृति में प्रकृति और पशुधन को देवता के समान पूजा जाता है, और गाय गोहरी इसी भावना की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है। गोहरी के दिन सुबह से ही पूरा गांव उत्सव में डूब जाता है। महिलाएं घर-आंगन को चार पांच दिन पूर्व से  गोबर-मिट्टी से लीपकर सुंदर चौक और रंगोली बनाती हैं, घरों के दरवाजों पर आम के पत्तों के तोरण लगाती हैं और आंगन में दीप जलाती हैं। वहीं पुरुष गाय-बैलों को नदी-तालाब में नहलाकर उनके सींगों पर तेल और रंग लगाते हैं, माथे पर तिलक करते हैं और गले में फूलों की माला, घुंघरू व नई रस्सी बांधकर उन्हें दूल्हे की तरह सजाते हैं। बच्चों में भी इस दिन विशेष उत्साह देखने को मिलता है, वे अपने-अपने बैलों को सजाने में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। दोपहर बाद गांव का गोवारी सजी हुई गायों को लेकर पूरे गांव में घूमता है और गाय गोहरी आदिवासियों की आस्था का पर्व बड़ी धूमधाम से बड़े बुजुर्ग,युवा-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में एक निश्चित जगह पर एकत्रित होते हैं। घर-घर के सामने महिलाएं आरती की थाली लेकर गायों का स्वागत करती हैं, उन्हें गुड़, चारा और अनाज खिलाती हैं और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस दौरान गायों के पैरों की धूल को भी पवित्र माना जाता है और लोग उसे माथे पर लगाते हैं। कई गांवों में इस दिन बैलों की दौड़ और शक्ति प्रदर्शन का भी आयोजन होता है, जिसमें पूरे गांव के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। शाम को गांव के निशित स्थान पर सभी एकत्र होकर सामूहिक भील, भिलाला पटेलिया बारेला समाज करते हैं और एक-दूसरे को दीपावली की शुभकामनाएं देते हैं। इस प्रकार गाय गोहरी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आदिवासियों की वह आस्था है जो उन्हें अपने पशुधन, खेती और प्रकृति से जोड़कर रखती है और यह संदेश देती है कि जो पशु हमारे लिए जीवन भर मेहनत करता है, उसका पूजन और सम्मान ही सच्ची दीपावली है। शहरों में जहां दीपावली पटाखों और दिखावे तक सीमित होती जा रही है, वहीं आदिवासी गांवों में आज भी यह पर्व मिट्टी, गाय, भाईचारे और सादगी से जुड़ा हुआ है, जो आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने का काम कर रहा है।

बीएल भूरा चन्द्र शेखर आजाद नगर भाबरा मध्यप्रदेश
9179231752

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