प्रो. स्मिता शंकर सृजना, बैंगलोर
दीपों की पावन बेला आई,
खुशियों ने फिर ली अंगड़ाई।
आँगन-आँगन दीप जलें,
हर चेहरे पर मुस्कान खिलें।
मिट्टी का दीप यही सिखाता,
खुद जलकर भी रोशनी फैलाता।
क्यों न हम भी ऐसे बन जाएँ,
दूसरों के जीवन में उजियारा लाएँ।
केवल घर की सजावट क्यों हो,
मन में भी प्रेम की आहट हो।
मिट जाएँ नफ़रत की दीवारें,
खुशियों से भर जाएँ संसार के द्वारे।
उस घर में भी दीप जलाएँ,
जहाँ अभाव के बादल छाए।
किसी उदास चेहरे को हँसाएँ,
किसी बेसहारे का हाथ थाम आएँ।
न धुआँ हो, न प्रदूषण की मार,
प्रकृति से भी करें सच्चा प्यार।
हरियाली और स्वच्छता अपनाएँ,
मिलकर सुरक्षित दीपावली मनाएँ।
लक्ष्मी केवल धन लेकर न आएँ,
ज्ञान और सद्बुद्धि भी साथ लाएँ।
मन में करुणा, कर्म में उजास हो,
हर रिश्ते में विश्वास का वास हो।
आओ इस बार संकल्प उठाएँ,
नफ़रत नहीं, प्रेम के दीप जलाएँ।
दीपावली का संदेश यही अपनाएँ—
पहले अपने मन के अँधियारे मिटाएँ!
दीप से दीप जलता जाए,
हर जीवन खुशियों से भर जाए।
यही हमारी सच्ची दिवाली हो,
हर दिल में प्रेम की खुशहाली हो।
