अंधियारे को चीरकर, फिर आई दीपावली,हर आँगन में रोशनी की सौगात लाई दीपावली। दीपों की जगमग से, धरती मुस्कुराती है,रंगोली के रंगों से, हर राह सज जाती है। आसमान में…
Year: 2026
हृदय-दीप
सहस्रार के नील-गगन में राम, धवल आदर्श-सा, मूलाधार की श्याम-धरा पर सीता, मौन-उत्कर्ष-सा! बीच हृदय का अनाहत स्वर, बिना जला, बिना बुझा, अग्नि-परीक्षा नहीं, प्रेम-सेतु था अनसुझा! सीता ज्वाला नहीं, ज्वाला की आद्य-शिखा, स्वयं-प्रभा, रावण-कर ने छुआ छाया को, छू सका न प्रभा! अग्नि से कहाँ निकलना था उसे, जो अग्नि-स्वरूपा थी, राम को आना था हृदय तक, मर्यादा से ऊपर उठी! पर राम रहे सहस्रार में ही, लोक-लाज के शास्त्र में, सीता लौटी धरा-गर्भ में, मौन-व्यथा के पात्र में! आज दीपावली फिर आई, जगमग अयोध्या-द्वार है, पर हृदय के निभृत-आले में एक दीप अभी उदास है! जला सको तो इस बार तुम अनाहत में एक दीप जला दो, सहस्रार से मूलाधार तक हृदय का सेतु बना दो! तभी दीपावली सार्थक होगी, तभी राम घर आएंगे, धरा-गगन के बीच हृदय में जब दोनों मुस्कुराएंगे! नाम : संगीता जड़िया पद : सृजन सारथी / संस्कार न्यूज़ शहर : अजमेर मोबाइल नंबर:9414006311
दीपों का त्योहार
दीपों का त्योहार ,दिवाली खुशियाँ लाई। चमके सब घर द्वार,बनी छवि अति सुख दाई।। मिलकर सब परिवार, घरों को बहुत सजाते। पहनें नव पोशाक,साथ मिल पर्व मनाते।। गुंजा मोहन थाल,बनीं भरपूर मिठाई। मठरी औ नमकीन,थाल भर खूब सजाई।। पूजन लक्ष्मी मातु,साथ परिवार सुहाया। सज्जित दीप कतार, पटाखे बचपन लाया।। ठाकुर के दरबार,दीप सब अर्पित करते। लगता उत्तम भोग,भेंट सह श्रीफल धरते।। श्रद्धा सहित प्रणाम, बङों को शीश नवायें। छोटों को कर प्यार , स्नेह से गले लगायें।। बसें पास जो दीन,ख्याल उनका भी रखना। यथा -शक्ति सहयोग,खुशी से झोली भरना।। बढता है सुख सार,पर्व जब साथ भेदभाव से दूर,प्रेम का हाथ बढाते।। पुष्पा शर्मा’कुसुम ‘
आओ हम दिवाली मनाएं
आओ हम सब मिलकर मनाएँ दिवाली का त्योहार, तम का अंधियारा दूर करें, जलाएँ दीप अपार। जगमग कर दें घर-आँगन, हो समृद्धि की बौछार, सुखमय हो सबका जीवन, महके द्वार-द्वार।। इसी दिवस पूर्ण हुआ था श्रीराम का वनवास, सीता-राम और लखन पधारे अपने निवास। झिलमिल दीप जलाकर लोगों ने पर्व बनाया खास, तब से चली आ रही परंपरा कार्तिक मास।। इस अमावस्या की रात्रि को करते प्रकाशवान, संध्या समय लक्ष्मी पूजन का है विशेष विधान। वंदन करते श्री गणेश और कुबेर भगवान, तत्पश्चात प्रसाद बाँटते परिवार और मेहमान।। भारत का सबसे प्रमुख यह आनंदमय त्योहार, रंगों से रंगोली बनाकर सजाते घर-द्वार। स्नेह रूपी तेल से जलते दीपों की कतार, परदेसी भी घर आते मिलने अपने परिवार।। रसोईघर में बनते इस दिन ढेरों पकवान, मीठे-नमकीन व्यंजनों से खिल उठती मुस्कान। बाजारों से खरीदकर लाते वस्त्र और सामान, चमचमाती झालर लगाकर सजाते घर-दुकान।। सैनिक कवि – गणपत लाल उदय, अजमेर राजस्थान
