आखिर किस बात की दिवाली “

आखिर किस बात की दिवाली “

जब असूंअन बहके सूख चुकें,
आंखों में गहरी लाली हैं,
होंठों की सिलवटें टूट रही हैं,
ढांचा दिखलाती कंगाली हैं,
कीचड़ में डूबे काले रंगों में ही,
दिखती सुनहरी रंगोली हैं,
बासी जूठन के टुकड़ों से,
जिसने अपनी मीठी दुनिया सजा‌ली हैं,
ऐसे निराश अंधेरे मन के लिए,
अर्थहीन दीपों की अवली है।
आखिर किस बात…….. हैं।।
उस शीशमहल के रुतबे की भी क्या कहने,
जहां छोटी -सी भेंट समझ,
बंटते लाखों के गहने,
श्रद्धा का एक भी पुष्प ,
जहां कम पाया जाता हैं,
दिखावे की खातिर सोने की थाली में,
छप्पन भोग चढ़ाया जाता हैं,
रिश्तों में प्रेम मिठास नहीं जहां,
पैसों में नपती भाईचारे की थाली हैं,
राम आगति -सी बात नहीं,
खुशियों की गुल्लक खाली हैं।
वहां आखिर किस बात………. हैं।।
समता जब छायेगी चहुंओर,
खुशियां चहकेगी होगा मन हर्षित विभोर,
अपनत्व रंग में सजकर जब,
रंगीन तोरण खिल जायेगी,
सुंदर दृष्टि में सृष्टि झिलमिल,
स्वर्णिम आभा से सज जायेगी,
तभी सच्चे अर्थों में राम आमद कहलायेगी।
प्यारी खुशियों वाली दिवाली मनायी जायेगी।।
-खुशबू कुमारी (शिक्षिका)
‌‌सिवान (बिहार)

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