इस दीपोत्सव, एक दीप अंतर्मन में भी अवश्य जलाना होगा!
एक दीप अंतर्मन में भी अवश्य जलाना होगा!
आज दीपोत्सव आया है, कुछ प्रश्न उठाना अभी बाकी है; केवल घर-आँगन को ही नहीं, अभी हृदय को भी सजाना बाकी है।
किसके आँगन में अँधियारा है? किसकी आँखों में अभी नमी है?
किसके हिस्से में अभी भी भूख लिखी है? किसकी थाली में अभी भी कितनी कमी है?
मंदिर की लौ यह कहती है, मन में भी उजियारा तो होना ही चाहिए; मस्जिद, गुरुद्वारे की दुआ में हर मानव का सुख-सारा होना चाहिए।
धर्म वही, जो दुखियों के आँसू पोंछ सके; कर्म वही, जो गिरते जीवन को फिर से सँभाल सके।
कुम्हार के हाथों में भी स्वप्नों की मुस्कान रहे; श्रम करने वाले हर जन के जीवन में सम्मान रहे।
नारी को हरसंभव अधिकार मिले, निर्भय उसका स्वर्णिम संसार रहे; हर बच्चे के हाथों में पुस्तक, आँखों में उज्ज्वल विचार रहें।
धरती की साँसें सदा बचें, नदियों में निर्मल धार रहे; हर उत्सव में संयम का जगमग दीप जले, प्रकृति का हर पल सत्कार रहे।
जाति-धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर मिलना ही होगा हमें; नफ़रत के हर अँधियारे को प्रेम से आज हरना ही होगा हमें।
न धन से, न प्रदर्शन से, न ऊँची आवाज़ों से; जग बदलेगा सच्चे कर्मों और निर्मल प्रयासों से।
ओ मेरे जन-मन! आओ, ऐसा दीप जलाएँ हम, जो युगों-युगों तक एक अद्भुत, अद्वितीय और स्वर्णिम प्रकाश करे।
आओ, हम दीपक स्वयं बनें; आओ, दीपक हर परिवार बने!
सम्पूर्ण समाज दीपक बने, दीपक भारत देश बने और आखिर दीपक यह दुनिया बने!
यह वसुंधरा दीपोत्सव मनाए!
आओ, प्रेम का दीप जलाएँ!
आओ, कर्म का दीप जलाएँ!
आओ, मानवता का दीप जलाएँ!
ए-राज! आओ, एक दीप इस अंतर्मन में भी जलाएँ।
डॉ. राजपाल जोईया प्राध्यापक : हिंदी श्रीकरणपुर, जिला श्रीगंगानगर, राजस्थान।
