दीपोत्सव पर्व : परंपरा, विवेक और कर्म का अद्भुत समन्वय।

प्रस्तावना : दीपोत्सव भारतीय संस्कृति का बहुआयामी पर्व है, जिसमें प्रकाश केवल भौतिक उजास ही नहीं, बल्कि ज्ञान, न्याय, करुणा और सामूहिक चेतना का अद्भुत प्रतीक है। इसकी विविध परंपराएँ भारतीय समाज की बहुलता और निरंतरता व्यक्त करती हैं।

परंपरा और वर्तमान : श्रीराम के अयोध्या आगमन से जुड़ी लोकस्मृति, जैन परंपरा में महावीर निर्वाण तथा सिख परंपरा का बंदी छोड़ दिवस—ये प्रसंग दीपोत्सव के विविध सांस्कृतिक अर्थ रेखांकित करते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ आज भी अज्ञान से विवेक और निराशा से आशा की अनवरत यात्रा का आह्वान करता है। परंपरा का सम्मान करना रूढ़ि का आग्रह नहीं; उसे मानवीय मूल्यों के साथ वर्तमान में अर्थवान बनाना भी है।

समकालीन समस्या और प्रश्न : घर प्रकाशमान हों, तब भी क्या भूख, बेरोजगारी, भेदभाव, भ्रष्टाचार, स्त्री-असुरक्षा और पर्यावरण प्रदूषण का अंधकार स्वीकार्य है? क्या सेवा और उत्तरदायित्व से अलग रहकर पूजा पूर्ण हो सकती है? हां, हमारी आस्था अनुरूप हो सकती है परंतु उत्तर कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि में निहित है। ईमानदारी से  श्रम, शिक्षा, समान अवसर, स्त्री-सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता और संयमित उत्सव ही दीपोत्सव को सामाजिक अर्थ देते हैं, पूर्ण रूप में दे सकते हैं।

समन्वय और समाधान : मिट्टी के दीप स्थानीय कारीगरों का सम्मान जगाएँ; आतिशबाजी के स्थान पर पर्यावरण-सम्मत आयोजन हों; परिवारों में पीढ़ियों का अनवरत संवाद बढ़े; सभी धर्मों, वर्गों तथा समुदायों के लोग सद्भाव से सहभागी बनें। धर्म का सार है -करुणा, सत्य, न्याय और कर्तव्य में प्रकट हो तभी सार्थक होगा।

निष्कर्ष : दीपोत्सव तभी सार्थक है, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण से किसी व्यक्ति के जीवन के अंधकार को अनवरत कम करें। दीप जलाना आरंभ है; विवेकपूर्ण कर्म से समाज को प्रकाशित करना उसका उत्सव है। हमें ‘अप दीपो भव।’ को आत्मसात करना ही होगा साथ ही हमारे दीपोत्सव की सार्थकता पूर्णता की और अग्रसर ज़रूर होगी,हमारी भावना, आमजन के लिए निष्काम सेवा, समर्पण और समन्वय से अवश्य पूर्ण होगी।

डॉ सपना, प्राध्यापक हिंदी 

श्रीकरणपुर जिला श्रीगंगानगर, राजस्थान

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