मां की ममता


डॉ उषाकिरण श्रीवास्तव

कड़कड़ाती ठंड से अपने
लाड़ले को बचाने के लिए
मां के पास
सिर्फ ममता थी,
नहीं थे अपने बच्चों को
पहनाने के लिए
नहीं थे जैकेट नहीं थे ब्रांडेड स्वेटर
थर-थर कांपते बच्चों के लिए
सिर्फ ममता थी,
मुक्षे अच्छी तरह याद है
बड़े भैया के लिए
नया स्वेटर का बनना
अपने हाथों से बुनी थी
मेरी मां ने,
फिर क्या था ?
भैया का छोटा स्वेटर
मुझे पहनाया गया ,
फिर मेरे छोटे भाई ने पहना
उसे जब छोटा हो गया स्वेटर ,
अब मां ने उसे खोलकर
धागों के साथ मिलाकर
फिर से नया बना दिया ,
जिन बच्चों के पास नहीं थे स्वेटर
उसके लिए ,
अपनी साड़ी को दो टूक करके
गांती बांध दिया
करती थी मां ,
ममता के आगे
टिक नहीं पाती थी ठंड ।
मुजफ्फरपुर, बिहार
9334904712

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!