“माँ का आंचल”


जब इस जीवन से थक जाऊं
माँ तेरे आँचल में छुप जाऊं।

तेरे आँचल का है साया
मिले किसी तरुवर की छाया
वन में किसी फूल का खिलना
प्यासे को झरने का मिलना
तेज धूप में चलते-चलते
तरु की छाँव में रुक जाऊँ
माँ तेरे आँचल में छुप जाऊं।

माँ का हाथों से सहलाना
जीने की एक चाह जगाना
सही-गलत मुझको समझाना
सच क्या है दर्पण दिखलाना
चली थाम कर उंगली तेरी
कैसे वो अहसास भुलाऊं
माँ तेरे आँचल में छुप जाऊं।

तेरा मुझको गले लगाना
तक़लीफें मेरी थम जाना
सागर में नदिया का आना
लहरों का हिचकोले खाना
तेरी ममता के आंगन में
नन्हीं सी गुड़िया बन जाऊं
माँ तेरे आँचल में छुप जाऊं।

थपकी तेरी की याद है आती
लोरी गा जो मुझे सुलाती
सुंदर-सुंदर स्वप्न दिखाती
परियों के देश ले जाती
बंद पलकों से गोद में तेरी
परियों जैसा सुख मैं पाऊं।
माँ तेरे आँचल में छुप जाऊं।।

अपर्णा भटनागर

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