
माँ शब्द में विश्व समाया
है चेतन की धारा ।
जिसमें बहती आत्मा अपनी,
जीवन अर्थ सँवारा ।।
जन्म नहीं यात्रा है जग में,
जो भीतर ही चलती।
प्रतिध्वनित होती साँसों में,
धड़कन में छवि पलती ।।
माँ सच है इस नश्वर जग में,
अमर प्रेम की रेखा।
माँ ही शाश्वत प्रेम रूप है,
ईश्वर का यह लेखा ।।
जगत शून्य में भरे पूर्णता,
माँ में ज्ञान समाया।
जीवन का आधार होती माँ,
जग ने यह समझाया ।।
करुणा, ममता, प्रेम रूप में,
जीवन रस बरसाती।
अंधियारे में राह दिखाती,
अंतर दीप जलाती ।।
माँ ही मूल सृष्टि का स्वर है,
उसमें ब्रह्म समाया।
जिसने माँ अंतर में झाँका,
उसने ॠत को पाया।।
–डाॅ.छाया शर्मा,
