
इस दुनिया में आए मां की कोख से।
मां का आंचल मेरे लिए ममता का सागर है।
खुद भूखी रहकर हमें खिलाया,
मुझे छांव में सुलाकर खुद धूप में जलती रही।
जब मुझसे गलती हुई तो पीटा, डांटा,
और जब मैं रोया तो प्यार से लोरी सुनाकर हंसाया।
मां की ममता कहीं और नहीं मिल सकती।
तेरा एहसान मेरे लिए प्यार का सबसे बड़ा तोहफा है।
मां, तू इतनी समझदार कैसे बनी।
तू पढ़ी-लिखी नहीं है, फिर भी इतनी समझदार है।
मां के लिए कोई शब्द छोटा पड़ जाएगा।
मां तो एक अंतर्यामी है।
उसका वर्णन करना नामुमकिन है।
मां तो एक अक्षर है,
लेकिन इसमें इतनी ताकत कहां से आती है।
अगर कोई जोर-जोर से “मां, मां, मां” पुकारे,
तो एक अजीब सी आवाज गूंज उठती है।
मानो पूरी पृथ्वी कांपने लगती है।
मां भी तो एक पृथ्वी है,
जहां करोड़ों लोग रहते हैं।
ये महापुरुष, ये ऋषि-मुनि, ये क्रांतिकारी, ये साहित्यकार,
कोई भी हो, मां की कोख से ही पैदा हुए हैं।
अगर मां नहीं रहेगी,
तो यह पृथ्वी अंधेरे में डूब जाएगी।
यही है मां शब्द की महानता।
मां कभी सीता जैसी,
कभी मां शारदा,
कभी मां दुर्गा,
तो कभी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बन जाती है।
एक कुमारी लड़की भी मां का स्वरूप होती है,
इसीलिए उसकी पूजा की जाती है।
किशोर बेनर्जी
