
मां सुबह की पहली किरण,
मां मंदिर का पावन वंदन।
उसकी हंसी में फूल खिलें,
उसके आंचल में सुख मिलें।
थके कदम जब रुक जाते हैं,
मां के शब्द सहलाते हैं।
रोटी में वो प्यार सजाती,
भूखे मन को तृप्त कराती।
बारिश बनकर दर्द धोती,
चुपके-चुपके आंसू रोती।
मेरे हर सपने की डोरी,
मां से जुड़ी जीवन-डोरी।
अंधियारे में दीपक बनती,
सूखे मन में सरिता बहती।
उसकी ममता चांदनी जैसी,
उसकी बातें रागिनी जैसी।
धरती जैसी सहनशील है,
सागर जैसी गहरी दिल है।
मां ईश्वर का रूप महान,
उससे रोशन मेरा जहान।
सुनील कुमार
