मेरी माँ


डॉ वन्दना घनश्याला
“माँ” शब्द अपने आप में इतना महत्वपूर्ण है कि जिसकी परिभाषा दी ही नहीं जा सकतीl यह एक ऐसा धन है जो कभी समाप्त ही नहीं होताl जिसकी कद्र तब पता चलती है जब यह हमारे हाथों से रेत के कणों की तरह फिसल जाता है l

हम सभी को यही भ्रांति रहती है कि मेरी माँ कभी इस दुनिया से नहीं जाएगी जो कि अटल सत्य है l जब माँ नौ महीने अपनी कोख में बच्चे को रखती है जाने अंजाने उसके लिए त्याग भी करती है, शायद एक पुरुष को यह एहसास भी नहीं होगा कि कितने कष्ट वह सहती हैl चाहे बेटा हो या बेटी माँ के लिए दोनों बराबर होते हैंl

माँ की भूमिका का मेरे जीवन में एक ऐसा एहसास है जो मुझे शायद उनके चले जाने के बाद ज्ञात हुआ l मेरी माँ शायद सबसे अलग थीl आज भी 4 महीने बीत चुके माँ को हमसे जुदा हुए…फिर भी मेरा घाव नहीं भरा l

बच्चों के भीतर छुपी हुई सभी भावनाओं को माँ स्कैन कर लेती है l वह बात अलग है कि आज डिजिटल युग में माँ की भूमिका भी कहीं और अधिक बढ़ जाती हैl कदाचित लगता है ईश्वर भी माँ को इस धरा पर भेज कर निश्चिन्त हो गएl

बुढ़ापे में उनकी सेवा करके तथा उन्हें सदा आदर सत्कार दे कर अपना कर्तव्य निभाएँ l कहीं बात में हमें यह न सोचना पड़ जाए..

“रात बेरात याद आती हो
आँसू बन झड़ जाती हो
ऐसे कोई धोखा देता है क्या
जाने कहाँ गुम हो जाती हो”?

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