मां की छवि

पूज्य मां की स्मृतियों को सादर नमन के साथ कृतज्ञतापूर्ण आभार।


पूज्य मां की स्मृतियों को सादर नमन के साथ कृतज्ञतापूर्ण आभार।

मां मेरी वचनावती, छवि उनकी उर लाय।
प्रकट करूं कवि भाव में, कुछ उनके गुण गाय।।

इतना संबल था भरा, उनके तन मन भाल।
तोड़ न पायीं हौसला, कठिन दशा विकराल।।

गेहूं पीसीं जांत‌ में, कांडी़ कूंटीं धान।
चकिया में दालें दरीं, लगी न उन्हें थकान।।

पानी गहरे कूप से, खींचीं रस्सी जोड़।
ढो़कर लायीं घर उसे, स्वय़ं हथेली मोड़।।

शौच क्रिया के वास्ते, बाहर जातीं भोर।
मौसम जाडा़ हो गरम, या बारिश घनघोर।।

कंडी लकडी़ को जला, सहते धुंआं अपार।
भोजन भी देती रहीं, सारे कुल परिवार।।

भले उठीं हों भोर में, सोयीं आधी रात।
तब भी वे सुनतीं सहीं , सबकी कड़वी बात।।

गृह कार्यों के साथ ही, गयीं खेत खलिहान।
जन्म तथा पोषण दिया, पालीं षट संतान।।

शायद यह अंतिम रही, मां पीढ़ी इस लोक।
जिसने इतना श्रम किया, फिर भी घिरीं न शोक।।

माता पर ‘आत्रेय’ यह, गर्व कर रहा आज।
जिनकी महिमा से खिला, जीवन लोक समाज।।

मौलिक एवं निजी भाव
गंगा प्रसाद यादव ‘आत्रेय’

इतना संबल था भरा, उनके तन मन भाल।
तोड़ न पायीं हौसला, कठिन दशा विकराल।।

गेहूं पीसीं जांत‌ में, कांडी़ कूंटीं धान।
चकिया में दालें दरीं, लगी न उन्हें थकान।।

पानी गहरे कूप से, खींचीं रस्सी जोड़।
ढो़कर लायीं घर उसे, स्वय़ं हथेली मोड़।।

शौच क्रिया के वास्ते, बाहर जातीं भोर।
मौसम जाडा़ हो गरम, या बारिश घनघोर।।

कंडी लकडी़ को जला, सहते धुंआं अपार।
भोजन भी देती रहीं, सारे कुल परिवार।।

भले उठीं हों भोर में, सोयीं आधी रात।
तब भी वे सुनतीं सहीं , सबकी कड़वी बात।।

गृह कार्यों के साथ ही, गयीं खेत खलिहान।
जन्म तथा पोषण दिया, पालीं षट संतान।।

शायद यह अंतिम रही, मां पीढ़ी इस लोक।
जिसने इतना श्रम किया, फिर भी घिरीं न शोक।।

माता पर ‘आत्रेय’ यह, गर्व कर रहा आज।
जिनकी महिमा से खिला, जीवन लोक समाज।।

मौलिक एवं निजी भाव
गंगा प्रसाद यादव ‘आत्रेय’

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