
ब्रह्मांड की अद्भुत नगीना।
सिखाया तूने जीवन जीना।
तू ही मंदिर और गिरजाघर,
चरणों में है मक्का,मदीना।
याद तेरी शबनम की मोती।
ओस में भीगीं ठंडक सी होती।
मूरत तेरी यादों के बक्से में,
माँ तू मेरी सपनों की ज्योति।
उन लम्हों में हम खो गए।
आँचल ओढ़ कर सो गए।
पल पल तेरी ममता में भीगे,
तुम बिन जीना सीख गए।
प्यार दुलार एक सा था।
बँटा नहीं टुकड़ों में था।
एक समान नज़र थी तेरी,
भेद -भाव का भाव ना था।
माँ बनकर क़ीमत जान गई ।
दिल का हालत पहचान गई ।
क्यों है माँ शक्ति का रूप,
तेरी कोख पाऊँ हर जन्म माई।
सविता गुप्ता
