संस्कारों की बुनियाद

मां के संस्कारों की बुनियाद
जीवन का अनुपम है श्रृंगार
उंगली पकड़ कर है चलाया
अपने लक्ष्य पर है पहुंचाया।

रूठ जाते तो मनाती है मां
आसूंओं की कीमत जानती
रोक लेती रूठे पलो को वो
सच बहुत ही प्यारी है मां।

जिम्मेदारियों का पुतला मां
सबका ख्याल रखती है मां
थक जाती पर नहीं बताती
खुशी का आंगन है मेरी मां।

आदर सत्कार की दुनिया
समझदारी की पोटली मां
सबको एक कर चलाती
घर को स्वयं स्वर्ग बनाती।

बच्चों का भविष्य बनाती
चोट लगने पर खुद रोती
सबके दुख स्वयं पर लेती
भगवान का आशीर्वाद मा।

सुचेता कटारिया

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