
मां शब्द है कितना छोटा,
जगत छुपा भोले का होता,
सिक्का होता है वह खोटा,
जो मां का आंचल नहीं छूता।
मां शब्द …..
स्नेह भरी करुणा की मूरत,
होती है ईश्वर की सूरत,
धड़कन जब-भी धड़का करती,
मां आशीष दिया करती।
मां शब्द ….
अगला-पिछला जो ना सोचे,
समय की धारा में बह जाए,
बहती नदियां हैं सागर-सी,
मां में सारा जगत समाए।
मां शब्द….
आओ सारे जन मिलकर हम,
मां के चरणों में झुक जाएं,
तेरा-मेरा छोड़ के सारा,
जीवन अपना सफल बनाएं।
मां शब्द ……
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मेरी मां ..विमला त्रिपाठी को समर्पित शब्द..।
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर,इन्दौर (म.प्र.)
