मेरे ईश्वर को मै देखूं…

जिसने मुझे है लिखा,
उस पर क्या मै लिखूं।
जिधर मेरी नजर जाए,
उधर मां ही मां,मैं देखूं।।

कर्जदार रहूंगा मैं,उम्र भर,
एहसानमंद रहूंगा,उम्र भर।
ना मुमकिन है,विकल्प उसका,
हर सूं मैं उसकी,मूरत देखूं।।

हर जिद मेरी,संयम से पूरी करती,
भूलकर भी कभी,अफसोस ना करती।
अपना जीवन लुटाकर,वो खुश होती,
मैं उसकी सूरत में,भगवान को देखूं।।

खोने की कल्पना से,जी घबराए,
लाखो के मोल से,ये मिल ना पाए।
अद्वितीय,अनमोल ये मेरी पूंजी है,
मेरे ईश्वर को,बस मैं ही मैं देखूं।।

©®
सुखेन्द्र कुमार माथुर
जोधपुर (राज.)
9782100250

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