
माँ एक एहसास है वात्सल्य का
एक कवच है औलाद का
अठन्नी, रुपए की दिन भर कर मज़दूरी
भागती, दौड़ती कुएँ से पानी लाती
चूल्हा जला शाम को रोटी सेंकती
काम सारा समेट थकान मिटाती
घास काट गठर बनाकर माथे पर उठा गौशाला लाती
फिर कहीं पांच रुपल्ली पाती
खुद थी निरक्षर पर अक्षर खूब समझती
हम भाई बहनों को पढ़ा काबिल बनाया
पिता के साथ मिल एक आशियाना बनाया
अपने अथक परिश्रम के पसीने की खुशबू से सजाया
पिता इहलोक गमन कर गए
माँ भरे पूरे घर मे अकेली रह गईं
इस जरा में आदि व्याधि से घिर गईं
माँ के आँचल मे पाया सुकून है
माँ के आशीर्वाद से जीवन में मिली प्रगति है
माँ के चरणों मे ही पाई जन्नत है
लिख ना सकूँ ऐसा कोई कलाम
तेरी खातिर हज़ार बार मरकर भी मेरी रूह कहे
माँ तुझे सलाम.
मेरी माँ श्रीमती छोटी देवी को सादर समर्पित
नरेश कुमार चौहान
27,विकास नगर बी.गिरधारी पुरा जयपुर 302021
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